यूपी उदय मिशन

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यूपी उदय मिशन

तीन करोड वाद वनाम न्यायपालिका

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तीन अप्रैल को दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला मे एक खबर छपी जजों की कमी से मुकदमों का अम्‍बार । खबर काफी ज्ञानवर्द्धक और विचारणीय थी। खबर मे बताया गया था कि विभिन्‍न न्‍यायालयों मे 3 करोड से अधिक मुकदमे लम्बित हैं केवल विभिन्‍न हाईकोर्ट मे ही 39 लाख मुकदमे लम्बित है। खबर मे विभिन्‍न न्‍यायालयों मे न्‍यायाधीशों की कमी के वारे मे लिखा गया था और अन्‍त मे लिखा गया था कि यदि इन मुकदमो का निपटारा ये अदालते करे तो इनके निपटारे मे न्‍यायालयों को 320 वर्ष लग जायेगे। अब प्रश्‍न उठता है कि क्‍या किया जाय कि इन मुकदमों का निस्‍तारण त्‍वरित गति से हो और न्‍यायालयों मे अनायास मुकदमें दायर न किये जायं।संविधान की एक धारा है 226 जिसके तहत कोई भी व्‍यक्ति किसी मामले पर उच्‍च न्‍यायालय मे वाद दायर कर सकता है। यह वाद चाहे वोर्ड परीक्षा की किसी कापी की स्‍क्रूटनी कराने से सम्‍बन्धित हो या नीचे की अदालतों मे लम्बित मुकदमों को एक्‍सपेडाइट कराने या ग्राम प्रधान की जांच कराने से सम्‍बन्धित हों हर काम के लिये हाई कोर्ट का दरवाजा खुला है। प्राय: देखा जाता है कि उच्‍च न्‍यायालय के समक्ष ऐसे वाद विचार के लिये आ जाते है जिनमे माननीय न्‍यायाधीश भी झुझला जाते है। ऐसे महत्‍वहीन मुकदमों के कारण गम्भीर मामलों पर विचार के लिये न्‍यायालयों के पास समय ही नही बचता और गम्‍भीर प्रकरण गौण हो जाते है।

Last Updated on Wednesday, 07 April 2010 11:23
 

देश को इडियटस की जरूरत है

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कुछ दिन पहले मैने आमिर खान की थ्री इडियट फिल्‍म देखी । यह एक वेहद शिक्षाप्रद फिल्‍म है। फिल्‍म देखने के बाद मै सोचती रही कि समाज को इस फिल्‍म से क्‍या शिक्षा मिलती है। काफी सोच विचार करने के वाद मै इस निष्‍कर्ष पर पहुची कि भारत को राजनैतिक सामाजिक तथा आर्थिक इडियटस की जरुरत है।

प्रश्‍न उठता है इडियट कौन है ? सामान्‍य तौर पर जब कोई व्‍यवस्‍था प्रतिपादित की जाती है तो वह थोडे बहुत उतार चढाव के बाद समय के साथ साम्‍य बना लेती है। समय के साथ व्‍यवस्‍था मे आंशिक बदलाव जरूरी होता है लेकिन इसको चलाने वाले इसमे वदलाव स्‍वीकार नही करते फलस्‍वरूप व्‍यवस्‍था मे जडत्‍व आ जाता है और वह अप्रासंगिक हो जाती है। यथास्थितिवादी लोग इसमे परिवर्तन नही चाहते और वे लोग जो इस व्‍यवस्‍था मे परिवर्तन करना चाहते है इडियट कहलाते हैं।

Last Updated on Wednesday, 07 April 2010 11:21
 

आपका पेट भरा है इसलिये पर्यावरण की चिन्ता है हमे तो भूखों मत मारो।

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पिछले कई दिनों से बी0टी0बैगन को लेकर भारत सरकार के दो मंत्री आने सामने है जहां क`षि मंत्री शरद पवार जी0एम्‍0 फसलो के पक्ष मे हैं वही पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश जी0एम्‍0 का विरोध कर रहे हैं। वी0टी बैगन का विरोध करने वाले मुख्यष रूप से दो विन्दु ओं पर विरोध किया जा रहा है। प्रथम वी0 टी0 बैगन से जैव विवि‍धता खत्म् होने का खतरा है दूसरा वी0टी0 बैगन मानव स्वा स्य्वा के लिये हानिकारक है। इस सम्बटन्ध‍ मे मै इस शदी के साठ के दशक का उल्लेमख करना चाहूगा। उस समय पूरे विश्वो मे खाद्यान की कमी थी वि‍शेषकर तीसरी दुनिया मे खाद्यान का भीषण अभाव था। तीसरी दुनिया के लोग पारंपरिक ढंग से खेती कर रहे थे। उच्च् तकनीकी का अभाव था। किसानों द्वारा पारम्पयरिक ढंग से धान गेहूं की पुरानी प्रजातियां उगाई जा रही थी जिनमे अधिक खाद का प्रयोग फसलों मे लाजिंग के कारण फसल का उत्पा दन घट जाता था। साठ के दशक मे मेक्सिखको को के वैज्ञानिक डा0 नार्मन अर्नेस्टि बोर्लाग ने गेहू की फसल मे जापानी जंगली  गेहू की प्रजाति से नोरिन-10 जीन (बौना करने वाली जीन) को गेहू की फसलों मे संकरण क्रिया द्वारा स्थाीनान्तधरित किया ‍परि‍णाम स्वोरूप गेहू की लारमारोजो और अन्यग प्रजातियां तथा इसी प्रकार धान मे डवार्फिग जीन का प्रयोग कर धान की आई आर-8 आई आर-20 आई आर-24 आदि प्रजातियां विकसित की गई। इन प्रजातियों ने भारतवर्ष मे खाद्यान उत्पाआदन की दशा एवं दिशा बदल दिया। आज भारतवर्ष न केवल खाद्यान के मामले मे आत्मतनर्भिर है बल्कि दूसरे देशों को खाद्यान की आपूर्ति कर रहा है। लेकिन इसके दुष्पारिणाम क्याल रहे। भारतवर्ष के उत्तपरी भाग मे साठ के दशक मे के-68 के-65 गेहू की प्रजातियां वोई जाती थी। इन प्रजातियों मे लाइसीन प्रतशित अधिक होने के कारण इनमे चपाती क्वामलिटी अच्छी- थी लेकिन उत्पा दन कम था। लोगो ने समय काल के अनुसार नयी प्रजातियों को अपनाया। परिणाम स्वूरूप खाद्यान का संकट खत्मो हुआ लेकिन जैव विविधता भी खत्मस हो गई। क्याी जैव विविधता को संरक्षित रखने के नाम पर नई प्रजातियों को प्रयोग न किया जाना उचित था। यदि हम नवीन तकनीकी का प्रयोग न करते तो क्यास खाद्यान मे मामले मे आत्मिनि‍र्भर हो पाते शायद नही। चूकि उस समय हमारा देश भूख से विविला रहा था इसलिए उस समय हमारी प्राथमिकता अपने लोगो को भोजन उपब्धण कराना था न कि जैवविवधिता की रक्षा करना । आज हमारे देश की 70 प्रतिशत जनता कषि पर नि‍र्भर है और उनमे से अधिकांश किसान लघु सीमान्त् श्रेणी के है । ये किसान अपनी छोटी सी जोत मे अपने श्रम से सब्जीअ एवं अन्यि फसलों का उत्‍पादन कर अपना पेट पालते है। उन्नात किस्मे इन किसानों को कम खेत मे अधिक उत्पातदन देती है। वी0टी0 बै्गन इन किसानो के लिये वरदान सिद्ध हो सकता है। लेकिन समाज के ठेकेदार जो पर्यावरण को सुधारने का ठेका ले रखे है इसका अन्धाि विरोध कर रहे है। उन्हेल शायद इस तथ्यज का ज्ञान नही है कि पूर्व मे प्रयोग की जाने वाली परागण विधि भी जीन स्था नान्तीरण की एक विधि थी। उस समय वायोटेक्नोकलाजी के रीकाम्बीलनेन्टा टेक्नोवलाजी का ज्ञान नही था जिस कारण एैक्च्छि जीन का प्रथक्कारण एवं उसका स्था नान्तयरण किसी दूसरी कोशिका मे किया जाना सम्भेव नही था। लेकिन समय के साथ एैक्च्छि जीन की पहचान करना उसका प्रथक्ककरण एवं उसका स्थाकनान्तारण सम्भ व हो सका है। आज नवीन तकनीकी का प्रयोग कर किसी पादप कोशिका या जन्तुम कोशिका मे पाये जाने वाली जीन को अलग कर उसे किसी अन्यय पौध या जन्तुक कोशिका मे स्थाकनान्तदरित किया जा सकता है।इस तकनीकी का प्रयोग कर वैज्ञानिक नवीन प्रजातियो का विकास कर रहे हैं। ये विकसित प्रजातियां वीमारियों तथा कीटो के प्रति अधिक रेजिस्टेंिट है। फलस्‍वरूप इनका उत्पा दन अधिक है लेकिन आज के पर्यावरणविद केवल विरोध के नाम पर इसका विरोध किये जा रहे है। प्राय: देखा जाता है वे इन्जाकइम या हार्मोन जो पौधों के लिये लाभदायक होते है मानव कोशिकाओं के लिये भी लाभदायक होते है। वी0टी0 बैगन से मानव स्वा स्य्रण पर क्याा बुरा प्रभाव पडेगा उसका कोई आंकडा उपलब्धज नही है केवल आशंका के आधार पर विरोध किया जा रहा है। आगे का समय नवीन तकनीकी का है जो देश नवीन तकनीकी मे पिछड जायेगा उसका विकास भी पिछड जायेगा। इसलिये केवल आशंका को आधार पर विरोध करना बन्दग करे ।
आपका पेट भरा है इसलिये पर्यावरण की चिन्ता है हमे तो भूखों मत मारो।

Last Updated on Wednesday, 07 April 2010 11:16